माता-पिता पर आश्रित विवाहित बेटियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से विवाहित बेटी को बाहर करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले रद्द कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि माता-पिता पर आश्रित विवाहित बेटी सेवा के दौरान माता-पिता की मृत्यु होने पर अनुकंपा रोजगार की पात्र है। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि वैवाहिक स्थिति किसी कल्याणकारी योजना के तहत बेटी को लाभ से वंचित करने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक आराधे की बेंच ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति से विवाहित बेटी को बाहर नहीं किया जा सकता। दरअसल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अनुकंपा नियुक्ति के उद्देश्य से परिवार की परिभाषा में विवाहित बेटी को शामिल नहीं किया जा सकता। विभिन्न पूर्व के फैसले को ध्यान में रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने मामले को सुप्रीम कोर्ट के पास भेजा था। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि रंजना मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट के मत को बरकरार रखा। साथ ही इलाहाबाद हाईकोर्ट के खिलाफ फैसले को रद्द कर दिया।
सैदा बेगम का मामला सही कानूनी आधार नहीं: SC
मंगलवार को सुनाए गए फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सैदा बेगम का मामला सही कानूनी आधार नहीं है। इस मामले में रिकॉर्ड में मौजूद सबूतों से यह साबित होता है कि अपीलकर्ता (विवाहित बेटी) विवाह के बाद भी उसी गांव में रहती रही और अपनी मां को उचित मूल्य की दुकान चलाने में सक्रिय रूप से सहायता करती रही और अपनी मां के निधन के बाद अपीलकर्ता ने अपनी शारीरिक रूप से अक्षम बहन की जिम्मेदारी संभाली, ऐसे में विवाहित बेटी होने के आधार पर उसका आवेदन खारिज करना संवैधानिक रूप से अमान्य है।
विवाहित बेटी को दुकान का लाइसेंस जारी करने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने विवाहित बेटी को दुकान का लाइसेंस देने से इनकार करने वाले आदेशों को रद्द कर दिया और सक्षम अधिकारियों को चार हफ्ते के भीतर वैध लाइसेंस आदेश जारी करने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि वह बॉम्बे हाई कोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट के उन सभी फैसलों से सहमत है, जिनमें कहा गया है कि वैवाहिक स्थिति किसी पात्र बेटी को कल्याणकारी योजना से वंचित करने का वैध आधार नहीं हो सकती
क्या है पूरा मामला
आपको बता दें कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक सिंगल बेंच द्वारा सुप्रीम कोर्ट को भेजे गए एक रेफरेंस से मामला जुड़ा था। इलाहाबाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने रेफरेंस में यह पूछा था कि क्या विवाहित बेटियों के अनुकंपा नियुक्ति के दावों को अस्वीकार किया जा सकता है, जबकि विवाहित बेटों के मामले में ऐसी कोई अक्षमता नहीं है। इस मामले में याचिकाकर्ता एक विवाहित बेटी ने अनुकंपा के आधार पर उचित मूल्य की दुकान चलाने के लाइसेंस के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। विवाहित बेटी ने 2019 के एक सरकारी आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें विवाहित बेटियों को ‘परिवार’ की परिभाषा से बाहर रखा गया था। बेटी विवाहित होने के बावजूद वह अपने परिवार के साथ रहती थी, एक विकलांग बहन की देखभाल करती थी और अपनी मां के साथ एक उचित मूल्य की दुकान चलाती थी। मां के निधन के बाद याचिकाकर्ता ने लाइसेंस के लिए आवेदन किया, जिसे अस्वीकार कर दिया गया था।