उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इंकार करने वाले अपने ही फैसले पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि UAPA केस में भी जमानत एक नियम है, जेल अपवाद है। कोर्ट ने आगे कहा कि इस फैसले में ‘केए नजीब’ मामले में तीन जजों की पीठ के फैसले का ठीक से पालन नहीं किया गया, जिसमें मुकदमे में लंबी देरी को जमानत का आधार माना गया था।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी कुपवारा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की। आरोपी द्वारा दर्ज किए गए नार्को-आतंकवाद के मामले में जून 2020 से जेल में बंद था। जस्टिस बीवी नागरत्ना और उज्ज्वल भुयान की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि जमानत नियम है और जेल अपवाद है, यह अनुच्छेद 21 और 22 से उत्पन्न एक संवैधानिक सिद्धांत है। निर्दोषता की धारणा कानून के शासन द्वारा शासित किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला है। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि छोटी पीठें बड़ी पीठों के फैसलों को कमजोर, दरकिनार या अनदेखा नहीं कर सकतीं, साथ ही यदि वे असहमत हों, तो वे केवल मामले को CJI के पास बड़ी पीठ के गठन के लिए भेज सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 2019 से 2023 के बीच भारत भर में यूपीए के तहत दोषसिद्धि दर 1.5% से 4% के बीच रही, जबकि जम्मू-कश्मीर में यह दर 1% से कम रही। केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा संसद के समक्ष रखे गए NCRB आंकड़ों का हवाला देते हुए जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि ये आंकड़े मुकदमे के अंत में ऐसे मामलों में बरी होने की उच्च संभावना की ओर इशारा करते हैं। आपको बता दें कि इसी साल 5 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली दंगों से जुड़े बड़ी साजिश के मामले में सात आरोपियों में से पांच आरोपियों को जमानत दे दी थी, जबकि दो आरोपी शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।