सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा की फिर से जांच करने के लिए पांच सदस्यीय उच्च-विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। CJI सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने अपने आदेश ने कहा कि दूरगामी पर्यावरणीय परिणामों वाले निर्णय विशेषज्ञ मूल्यांकन के बिना नहीं लिए जाने चाहिए। दरअसल, समिति की अध्यक्षता भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (ICFRE) के महानिदेशक पदेन करेंगे। समिति के सदस्यों में भारतीय वन सर्वेक्षण के पूर्व महानिदेशक डॉ. सुभाष आशुतोष, भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के पूर्व निदेशक डॉ. राजेंद्र कुमार शर्मा, पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के पूर्व संयुक्त सचिव बृज मोहन सिंह राठौर और दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. अशोक के भटनागर शामिल होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने IIHS के प्रो. जगदीश कृष्णस्वामी और हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो. लक्ष्मीकांत शर्मा को भी समय-समय पर समिति से जुड़ने के लिए विशेष आमंत्रित सदस्य के रूप में नामित किया है। MoEFCC में निदेशक रैंक का एक अधिकारी सदस्य सचिव के रूप में कार्य करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने समिति को एक सार्वजनिक सूचना जारी करने का निर्देश भी दिया है, जिसमें सभी इच्छुक लोग और संस्थाओं से ज्ञापन और सुझाव आमंत्रित किए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने समिति को 31 अगस्त तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट दायर करने का निर्देश दिया।मामले की अगली सुनवाई 7 सितंबर को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस बात को लेकर विशेषज्ञों की जांच जरूरी है कि क्या मौजूदा परिभाषा, जो अरावली पर्वतमाला को दो या दो से अधिक अरावली पहाड़ियों के बीच 500 मीटर के दायरे तक सीमित करती है, संरक्षित क्षेत्र को काफी हद तक संकुचित कर सकती है और “गैर-अरावली” क्षेत्रों के दायरे को बढ़ा सकती है,जिससे पारिस्थितिक रूप से जुड़े क्षेत्रों में खनन और अन्य विनाशकारी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने समिति को इस बात की भी जांच करने का कार्य सौंपा है कि राजस्थान की 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 पहाड़ियां ही निर्धारित 100 मीटर की ऊंचाई की सीमा को पूरा करती हैं या नहीं और क्या इससे बड़ी संख्या में पहाड़ी संरचनाएं पर्यावरणीय संरक्षण से वंचित रह जाती हैं।
आपको बता दें कि पिछले साल अरावली मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए अपने 20 नवंबर 2025 के फैसले पर रोक लगा दी थी। CJI सूर्यकांत की अध्यक्षता पीठ ने कहा था कि फिलहाल 20 नवंबर 2025 के फैसले को लागू नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने अपने आदेश में विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों और अपनी ही आदेश पर रोक लगा दी थी। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अब पर्यावरण विशेषज्ञों का नया पैनल बनाएगा जो पूरे रिपोर्ट का विश्लेषण करेगा।
गौरतलब है कि 20 नवंबर 2025 को तत्कालीन CJI बीआर गवई की बेंच ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के तहत बनी समिति की सिफारिशों को स्वीकार कर लिया था। इसके मुताबिक अरावली पहाड़ियां: ऐसी कोई भी जमीन जिसकी ऊंचाई स्थानीय भू-भाग (जमीन) से 100 मीटर या उससे अधिक हो। अरावली रेंज (पर्वतमाला): यदि दो या उससे अधिक ऐसी पहाड़ियां 500 मीटर के दायरे में हैं, तो उन्हें एक ही पहाड़ियों का समूह माना जाएगा। इन पहाड़ियों और रेंज के भीतर आने वाले सभी लैंडफॉर्म, उनकी ऊंचाई या ढलान चाहे जो हो, खनन से बाहर रहेंगे।