केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में राष्ट्रपति और राज्यपाल को बिल पर फैसला लेने के लिए समयसीमा निर्धारित किए जाने का विरोध किया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में संविधान में व्यवस्था के हर अंग के लिए शक्तियों के बंटवारे का उल्लेख करते हुए कहा है कि यहां कोई भी अंग अपने आप में ‘सुप्रीम’ नहीं है। केंद्र सरकार ने कहा है कि संविधान ने जानबूझकर राज्यपाल को बिल पर फैसला लेने को लेकर कोई समयसीमा तय नहीं की ताकि सवैंधानिक और राजनीतिक ज़रूरतों के लिहाज से इस प्रकिया को ‘लचीला’ रखा जा सके। सुप्रीम कोर्ट अपनी ओर से कोई समयसीमा या राज्यपाल के फैसला लेने का तरीका तय नहीं कर सकता और यह संविधान निर्माताओं के भावना के खिलाफ होगा।
केंद्र सरकार ने आगे कहा है कि राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने की समय-सीमा शक्तियों के नाजुक पृथक्करण को बिगाड़ देगी और संवैधानिक अव्यवस्था को जन्म देगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की ओर से लिखित दलीलों व जवाब में कहा गया है कि राज्यपालों और राष्ट्रपति पर राज्य विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए निश्चित समय-सीमा लागू करना सरकार के एक अंग द्वारा उन शक्तियों को अपने हाथ में लेने के समान होगा जो उसके पास निहित नहीं हैं, जिससे शक्तियों का नाजुक पृथक्करण बिगड़ जाएगा और संवैधानिक अव्यवस्था पैदा होगी। केंद्र सरकार ने कहा कि अनुच्छेद 142 में निहित अपनी असाधारण शक्तियों के तहत भी, सुप्रीम कोर्ट संविधान में संशोधन नहीं कर सकता या संविधान निर्माताओं की मंशा को विफल नहीं कर सकता, बशर्ते कि संवैधानिक पाठ में ऐसी कोई प्रक्रियागत जनादेश न हों, हालांकि स्वीकृति प्रक्रिया के कार्यान्वयन में कुछ सीमित समस्याएं हो सकती हैं, लेकिन ये राज्यपाल के उच्च पद को अधीनस्थ पद पर आसीन करने को उचित नहीं ठहरा सकतीं।
केंद्र ने तर्क दिया है कि राज्यपाल और राष्ट्रपति के पद राजनीतिक रूप से पूर्ण हैं और लोकतांत्रिक शासन के उच्च आदर्शों का प्रतिनिधित्व करते हैं उन्होंने कहा कि किसी भी कथित चूक का समाधान राजनीतिक और संवैधानिक तंत्रों के माध्यम से किया जाना चाहिए, न कि जरूरी ना होने वाले न्यायिक हस्तक्षेपों के माध्यम से। आपको दें कि मामले पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में 19 अगस्त से सुनवाई शुरू होने वाली है। CJI बीआर गवई की अध्यक्षता वाली 5 जजों संविधान पीठ 19 अगस्त से 10 सितंबर तक सुनवाई करेगी। राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए विधेयकों पर फैसला लेने के लिए समय सीमा तय करने का मामला है।